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हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा और श्रद्धा से जुड़ी हरकी पौड़ी के आसपास सामने आया एक वीडियो कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

हरकी पौड़ी / खड़खड़ी के बीच गंगा में घोड़े-खच्चरों से बजरी ढुलाई, पशु प्रेम पर उठे सवाल

हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में गंगा और श्रद्धा से जुड़ी हरकी पौड़ी के आसपास सामने आया एक वीडियो कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हरकी पौड़ी और खड़खड़ी के बीच गंगा की धारा में घोड़े-खच्चरों को उतारकर उनसे बजरी ढुलवाए जाने के दृश्य सामने आए हैं। वीडियो में बेजुबान पशुओं को पानी के बीच से गुजरते और अपने ऊपर बजरी का बोझ ढोते देखा जा सकता है।

हरकी पौड़ी और खड़खड़ी के बीच का यह क्षेत्र श्रद्धालुओं और पर्यटकों की लगातार आवाजाही वाला इलाका है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग यहां गंगा दर्शन और स्नान के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में गंगा की धारा के बीच पशुओं से बजरी ढुलाई का मामला केवल पशुओं के साथ व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि धार्मिक और पर्यटन क्षेत्र की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।

इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू बेजुबान पशुओं को लेकर है। जिन घोड़े-खच्चरों से यह काम कराया जा रहा है, वे अपनी पीड़ा या परेशानी स्वयं व्यक्त नहीं कर सकते। गंगा की धारा में उतारकर उनके ऊपर वजन लादना उनके लिए कितना कठिन है, इसका अंदाजा वीडियो में दिखाई दे रहे दृश्यों से लगाया जा सकता है।

यहां सवाल उन लोगों से भी है जो स्वयं को पशु प्रेमी और पशु अधिकारों का समर्थक बताते हैं। सोशल मीडिया पर पशुओं के संरक्षण और उनके प्रति संवेदनशीलता की बातें खूब होती हैं, लेकिन जब बेजुबानों के साथ वास्तविक परिस्थितियों में होने वाले व्यवहार का मामला सामने आता है तो आवाज कितनी बुलंद होती है, यह भी देखना होगा।

इस खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि सामने आए दृश्य के आधार पर एक जरूरी सवाल समाज के सामने रखना है। यदि पशु प्रेम केवल तस्वीरों, पोस्ट और अभियानों तक सीमित नहीं है, तो ऐसे मामलों में भी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी दिखाई देनी चाहिए।

हरकी पौड़ी केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। गंगा की पवित्रता और इस क्षेत्र की गरिमा के साथ-साथ बेजुबान पशुओं के प्रति संवेदनशील व्यवहार भी उतना ही जरूरी है। ऐसे में सामने आए वीडियो की वास्तविकता और परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि गंगा के बीच घोड़े-खच्चरों से बजरी ढुलाई किस उद्देश्य से और किन परिस्थितियों में कराई जा रही है।

अब सवाल यही है—क्या बेजुबानों की पीड़ा दिखाई देने के बाद भी पशु प्रेम केवल शब्दों तक सीमित रहेगा, या इस मामले में जिम्मेदार आवाजें वास्तव में उठेंगी?

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