देहरादून। गौतम बुद्ध चिकित्सा महाविद्यालय एवं सम्बद्ध डॉ. के.के.बी.एम. सुभारती अस्पताल में 29 मई 2026 को बायोकेमिस्ट्री विभाग द्वारा समेकित जैव-रसायन एवं आणविक चिकित्सा में भविष्य की प्रवृत्तियाँ विषय पर एक दिवसीय ज़ोनल स्तरीय सतत् चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रम (सीएमई) का भव्य एवं सफल आयोजन किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ। इस अवसर पर संस्थान के निदेशक डॉ. (ब्रिग.) वी.पी. सिंह, कुलपति डॉ. देश दीपक, प्राचार्य एवं डीन डॉ. अनिल मेहता, कार्यवाहक चिकित्सा अधीक्षक डॉ. प्रशान्त भटनागर तथा उप-प्राचार्य डॉ. रूपा हंसपाल सहित अनेक गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
अपने संबोधन में डॉ. (ब्रिग.) वी.पी. सिंह ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा में जैव-रसायन एवं आणविक चिकित्सा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती जा रही है, जो भविष्य में सटीक एवं व्यक्तिगत चिकित्सा (प्रिसीजन मेडिसिन) की आधारशिला सिद्ध होगी। वहीं कुलपति डॉ. देश दीपक ने ऐसे शैक्षणिक आयोजनों को चिकित्सकों के निरंतर ज्ञानवर्धन हेतु आवश्यक बताया, सुभारती मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य एवं डीन डॉ. अनिल मेहता ने शोध एवं नवाचार को चिकित्सा शिक्षा का अभिन्न अंग बताते हुए युवा चिकित्सकों को इसमें सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया।
उप-प्राचार्य डॉ. रूपा हंसपाल ने कहा कि इस प्रकार के सीएमई कार्यक्रम संस्थान की शैक्षणिक गुणवत्ता को सुदृढ़ करते हैं। कार्यवाहक चिकित्सा अधीक्षक डॉ. प्रशान्त भटनागर ने इसे क्लिनिकल प्रैक्टिस एवं शोध के बीच एक सशक्त सेतु बताया।
वैज्ञानिक सत्रों में देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से आए विशेषज्ञों ने अपने व्याख्यान प्रस्तुत किए। एमएएमसी, दिल्ली की प्रोफेसर डॉ. अनुभूति ने “नेक्स्ट जेनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS)” के माध्यम से रोगों के सटीक एवं प्रारंभिक निदान की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। यूसीएमएस एवं जीटीबी अस्पताल, दिल्ली की निदेशक प्रोफेसर डॉ. सीमा गर्ग ने रेगुलेटरी टी-कोशिकाओं की भूमिका बताते हुए इसे प्रतिरक्षा तंत्र एवं लिपिड मेटाबॉलिज्म के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बताया।
वीएमएमसी एवं सफदरजंग अस्पताल की प्रोफेसर डॉ. सुकन्या गंगोपाध्याय ने सेप्सिस के शीघ्र निदान में “होस्ट ट्रांसक्रिप्टोमिक सिग्नेचर्स” एवं “बायोसेंसर तकनीकों” की उपयोगिता को विस्तार से समझाया। एम्स ऋषिकेश की विभागाध्यक्ष डॉ. मनीषा नैथानी ने प्रिसीजन मेडिसिन में जैव-रसायन के समेकन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि भविष्य की चिकित्सा पूर्णतः रोगी-केंद्रित होगी।
दोपहर के सत्र में एचआईएमएस, जॉली ग्रांट के प्रोफेसर डॉ. किरण भट्ट ने न्यूरोडीजेनेरेटिव एवं अंतःस्रावी विकारों पर प्रकाश डाला। एसजीआरआरआईएमएचएस के डॉ. तारिक मसूद ने एचआईवी में माइक्रो आरएनए को एक महत्वपूर्ण बायोमार्कर बताया। सुभारती मेडिकल कॉलेज, मेरठ की डॉ. जस्किरण कौर ने मेटाबॉलिक सिंड्रोम में लिपिडोमिक्स की भूमिका स्पष्ट की। ग्राफिक एरा मेडिकल साइंसेज़ के डॉ. नीरज गुप्ता ने मूत्र के माध्यम से ब्लैडर कैंसर की प्रारंभिक जांच में “यूरिनरी cF-NA” की उपयोगिता बताई। वहीं जीबीसीएम के डॉ. अभिनव मनीष ने आणविक चिकित्सा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) की संभावनाओं को रेखांकित किया।
कार्यक्रम के दौरान पोस्टर प्रस्तुति एवं मूल्यांकन प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया, जिसमें स्नातकोत्तर विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने अपने शोध कार्य प्रस्तुत किए। यह सत्र युवा प्रतिभाओं के लिए अत्यंत प्रेरणादायक रहा।
कार्यक्रम की आयोजन अध्यक्ष एवं सचिव तथा बायोकेमिस्ट्री विभागाध्यक्ष डॉ. अनुराधा भरोसे ने बताया कि इस सीएमई का उद्देश्य चिकित्सकों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों को एक साझा मंच प्रदान करना है, जिससे वे नवीनतम वैज्ञानिक प्रगति से अवगत हो सकें एवं चिकित्सा क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा मिल सके।
कार्यक्रम का संचालन डॉ विनीता कालरा द्वारा किया गया तथा आऊओजन के समस्त प्रबंध में डॉ रितेश श्रीवास्तव की अहम भूमिका रही ।
अंत में पैनल चर्चा, पुरस्कार वितरण एवं धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। इस सीएमई को उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल द्वारा 03 क्रेडिट घंटे प्रदान किए गए।
इस सफल आयोजन में बड़ी संख्या में चिकित्सकों, संकाय सदस्यों, स्नातकोत्तर विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने सहभागिता की तथा इसे अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी बताया।

