✍️विक्टोरिया क्रॉस (VC) विजेता दरवान सिंह नेगी का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। कड़ाकोट, चमोली (उत्तराखंड) में जन्मे दरवान सिंह नेगी प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘विक्टोरिया क्रॉस’ पाने वाले दूसरे भारतीय थे।
उनकी प्रमुख उपलब्धियाँ और योगदान निम्नलिखित हैं:
📍. प्रथम विश्व युद्ध में अदम्य साहस (1914)
23-24 नवंबर 1914 की रात को फ्रांस के फेस्टुबर्ट (Festubert) सेक्टर में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने अद्भुत वीरता दिखाई। वह 39वीं गढ़वाल राइफल्स की पहली बटालियन में नायक के पद पर तैनात थे।
📍. वीरता का बेजोड़ उदाहरण
जब जर्मन सेना ने ब्रिटिश और भारतीय खंदकों (trenches) पर कब्जा कर लिया था, तब दरवान सिंह नेगी ने अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया। भीषण गोलीबारी और बमबारी के बीच, वह सबसे आगे रहे और एक-एक करके दुश्मन की खंदकों को वापस जीता। इस दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए थे (सिर और हाथ में चोट लगी थी), फिर भी उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया और तब तक लड़ते रहे जब तक कि जीत हासिल नहीं हो गई।
📍. विक्टोरिया क्रॉस (Victoria Cross) का सम्मान
उनकी इसी बहादुरी के लिए उन्हें विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया, जो ब्रिटिश सेना का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार है। वह तत्कालीन ब्रिटिश शासक किंग जॉर्ज पंचम के हाथों स्वयं यह सम्मान प्राप्त करने वाले पहले भारतीयों में से एक थे।
📍. कड़ाकोट और उत्तराखंड का गौरव
कड़ाकोट क्षेत्र के निवासी होने के नाते, उन्होंने पूरे गढ़वाल और भारत का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊंचा किया। उनकी उपलब्धियों ने उत्तराखंड के युवाओं को सेना में भर्ती होने और देश की सेवा करने के लिए दशकों तक प्रेरित किया है।
📍. सैन्य सेवा का सफर
प्रथम विश्व युद्ध के बाद भी उन्होंने सेना में अपनी सेवाएँ जारी रखीं। वे बाद में सूबेदार मेजर के पद तक पहुंचे और एक सम्मानित सैन्य जीवन व्यतीत किया।
आज भी लैंसडाउन (गढ़वाल राइफल्स का रेजिमेंटल सेंटर) में उनके सम्मान में स्मारक और संग्रहालय के हिस्से समर्पित हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को उनकी गाथा सुनाते हैं
आज भी उनका क्षेत्र शिक्षा स्वास्थ्य और यातायात से कोसों दूर है आज भी चुनावो में बड़े बड़े नेता आते है वादे करते है आज भी जस का तस बना है आखिर आम जनता किस के पास जाएं …

