दिल्ली के दरबार और लोकतंत्र का भ्रम
-क्लब संस्कृति, सत्ता नेटवर्क और आम आदमी की दूरी -डॉ. प्रियंका सौरभ- दिल्ली केवल भारत की राजधानी नहीं, बल्कि सत्ता की वह पुरानी चौसर है जहाँ मोहरे बदलते रहते हैं, पर खेल वही रहता है। यहाँ इतिहास केवल किताबों में नहीं बसता, बल्कि इमारतों की दीवारों, बंद दरवाज़ों और चमचमाते गलियारों में साँस लेता है।…

